June 8, 2026
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विशुद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्य है सरायकेला छऊ नृत्य कला, इसे फोक डांस का नाम नहीं दिया जाए… – Vananchal 24TV Live – वनांचल 24TV लाइव

विशुद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्य है सरायकेला छऊ नृत्य कला, इसे फोक डांस का नाम नहीं दिया जाए… – Vananchal 24TV Live – वनांचल 24TV लाइव
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मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर भारत सरकार से सीनियर फैलोशिप विजेता रजतेन्दु रथ और नाथू महतो छऊ कला के शास्त्रीयता पर बोले…..

सरायकेला: संजय मिश्रा

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विश्व प्रसिद्ध सरायकेला छऊ नृत्य कला विशुद्ध रूप से भारतीय शास्त्रीय नृत्य कला है। इसे फोक कला की श्रेणी में स्थान दिया जाना इस अनमोल नृत्य कला के प्रति सम्मान भाव को मिटाता है। सरायकेला छऊ नृत्य कला किस शास्त्रीय दृष्टिकोण पर शोध कर रहे भारत सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर से सीनियर फैलोशिप अवार्डी रजतेन्दु रथ उक्त बातें कहते हुए बताते हैं कि यह नृत्य संपूर्ण रूप से हिंदू शास्त्रीय और पारंपरिक रीति रिवाज हुआ है। सरायकेला छऊ नृत्य कला में सिर से पैरों तक भारतीय शास्त्रीयता की झलक है।

यह महान कला हर रूप में भगवान शिव और शक्ति पर आधारित है। यह विभिन्न सभ्यताओं और स्तरों को मिलाकर एक अनूठी कला निर्मित हुई है। जो बच्चों, युवा, वृद्धजन, वीर योद्धा, धार्मिक, शिक्षित, अशिक्षित, सभ्य सहित सभी श्रेणियों और समुदायों के लिए दिलचस्प एवं मंत्रमुग्ध करने वाला है। नर्तक की भाव भंगिमाएं और छऊ नृत्य संगीत की चुंबकीय शक्ति कला प्रेमियों को अपनी और आकर्षित करती है। कलाकार के निजी रंग और सुंदरता से दूर मुखौटा(मोहड़ा) सिर्फ और सिर्फ कलाकार की कला को प्रदर्शित करता है। अनेकता में एकता का प्रतीक इस छऊ नृत्य कला में जाति वर्ग का भेदभाव लोप होता है।

उन्होंने बताया कि तत्कालीन सरायकेला स्टेट के कला प्रेमी महाराजा आदित्य प्रताप सिंहदेव ने सरायकेला छऊ नृत्य के ता-ल को तांडव और लास्य दोनों का समावेश बताते हुए इसके ताल को संपूर्ण शास्त्रीय बताया है।

छऊ और शास्त्रीय संगीत के विशेषज्ञ सीनियर फैलोशिप अवॉर्डी गुरु नाथू महतो भी छऊ नृत्य कला के संगीत को नाट्य शास्त्र के सूत्र पर आधारित ताल को तीन भागों में विभक्त कर इस नृत्य के संगीत को शास्त्रीय संगीत के तौर पर प्रमाणित कर चुके हैं। शोधकर्ता रजतेंदु रथ अपने रिसर्च वर्क में अनुसंधान के जरिए इस नृत्य के भाव भंगिमा के अनुरूप प्राचीन मंदिरों में पाए गए चित्रों से इसकी शास्त्रीयता सिद्ध करते हैं। जिसके भाव भंगिमा का उल्लेख वेद पुराणों में भी है। जिसमें सरायकेला छऊ नृत्य कला का अर्धनारीश्वर नृत्य, प्रजापति नृत्य, मयूर नृत्य, रात्रि नृत्य, देवदासी नृत्य सहित अन्य कई दर्जनों नृत्य पौराणिक धर्म ग्रंथों से उद्धृत है। और इसके सारे रिचुअल्स संस्कार हिंदू धर्म आधारित है। जो इस महान सरायकेला छऊ नृत्य कला के शास्त्रीय होने का प्रतीक है।

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